सामायिक पाठ हमारी तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में खुद को समझने और सही दिशा में सोचने का महत्वपूर्ण अभ्यास है। इसका नियमित जाप हमारी सोच को सकारात्मक बनाता है और जीवन की गहरी समझ देता है। Samayik Paath सिर्फ पाठ नहीं, बल्कि आत्म-विकास और मानसिक शांति का एक सुंदर मार्ग है, जो हमारी दिनचर्या में शामिल होने से व्यक्तित्व को और निखारता है।
Samayik Paath
प्रेम भाव हो सब जीवों से,
गुणीजनों में हर्ष प्रभो।
करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,
दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥1॥
यह अनन्त बल शील आत्मा,
हो शरीर से भिन्न प्रभो।
ज्यों होती तलवार म्यान से,
वह अनन्त बल दो मुझको॥2॥
सुख दुख बैरी बन्धु वर्ग में,
काँच कनक में समता हो।
वन उपवन प्रासाद कुटी में नहीं खेद,
नहिं ममता हो॥3॥
जिस सुन्दर तम पथ पर चलकर,
जीते मोह मान मन्मथ।
वह सुन्दर पथ ही प्रभु मेरा,
बना रहे अनुशीलन पथ॥4॥
एकेन्द्रिय आदिक जीवों की
यदि मैंने हिंसा की हो।
शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह,
निष्फल हो दुष्कृत्य विभो॥5॥
मोक्षमार्ग प्रतिकूल प्रवर्तन
जो कुछ किया कषायों से।
विपथ गमन सब कालुष मेरे,
मिट जावें सद्भावों से॥6॥
चतुर वैद्य विष विक्षत करता,
त्यों प्रभु मैं भी आदि उपान्त।
अपनी निन्दा आलोचन से करता हूँ
पापों को शान्त॥7॥
सत्य अहिंसादिक व्रत में भी
मैंने हृदय मलीन किया।
व्रत विपरीत प्रवर्तन करके
शीलाचरण विलीन किया॥8॥
कभी वासना की सरिता का,
गहन सलिल मुझ पर छाया।
पी पीकर विषयों की मदिरा
मुझ में पागलपन आया॥9॥
मैंने छली और मायावी,
हो असत्य आचरण किया।
परनिन्दा गाली चुगली जो
मुँह पर आया वमन किया॥10॥
निरभिमान उज्ज्वल मानस हो,
सदा सत्य का ध्यान रहे।
निर्मल जल की सरिता सदृश,
हिय में निर्मल ज्ञान बहे॥11॥
मुनि चक्री शक्री के हिय में,
जिस अनन्त का ध्यान रहे।
गाते वेद पुराण जिसे वह,
परम देव मम हृदय रहे॥12॥
दर्शन ज्ञान स्वभावी जिसने,
सब विकार हों वमन किये।
परम ध्यान गोचर परमातम,
परम देव मम हृदय रहे॥13॥
जो भव दुख का विध्वंसक है,
विश्व विलोकी जिसका ज्ञान।
योगी जन के ध्यान गम्य वह,
बसे हृदय में देव महान्॥14॥
मुक्ति मार्ग का दिग्दर्शक है,
जनम मरण से परम अतीत।
निष्कलंक त्रैलोक्य दर्शी
वह देव रहे मम हृदय समीप॥15॥
निखिल विश्व के वशीकरण वे,
राग रहे न द्वेष रहे।
शुद्ध अतीन्द्रिय ज्ञान स्वभावी,
परम देव मम हृदय रहे॥16॥
देख रहा जो निखिल विश्व को
कर्म कलंक विहीन विचित्र।
स्वच्छ विनिर्मल निर्विकार
वह देव करें मम हृदय पवित्र॥17॥
कर्म कलंक अछूत न जिसको
कभी छू सके दिव्य प्रकाश।
मोह तिमिर को भेद चला जो
परम शरण मुझको वह आप्त॥18॥
जिसकी दिव्य ज्योति के आगे,
फीका पड़ता सूर्य प्रकाश।
स्वयं ज्ञानमय स्व पर प्रकाशी,
परम शरण मुझको वह आप्त॥19॥
जिसके ज्ञान रूप दर्पण में,
स्पष्ट झलकते सभी पदार्थ।
आदि अन्तसे रहित शान्तशिव,
परम शरण मुझको वह आप्त॥20॥
जैसे अग्नि जलाती तरु को,
तैसे नष्ट हुए स्वयमेव।
भय विषाद चिन्ता नहीं जिनको,
परम शरण मुझको वह देव॥21॥
तृण, चौकी, शिल, शैलशिखर नहीं,
आत्म समाधि के आसन।
संस्तर, पूजा, संघ-सम्मिलन,
नहीं समाधि के साधन॥22॥
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में,
विश्व मनाता है मातम।
हेय सभी हैं विषय वासना,
उपादेय निर्मल आतम॥23॥
बाह्य जगत कुछ भी नहीं मेरा,
और न बाह्य जगत का मैं।
यह निश्चय कर छोड़ बाह्य को,
मुक्ति हेतु नित स्वस्थ रमें॥24॥
अपनी निधि तो अपने में है,
बाह्य वस्तु में व्यर्थ प्रयास।
जग का सुख तो मृग तृष्णा है,
झूठे हैं उसके पुरुषार्थ॥25॥
अक्षय है शाश्वत है आत्मा,
निर्मल ज्ञान स्वभावी है।
जो कुछ बाहर है, सब पर है,
कर्माधीन विनाशी है॥26॥
तन से जिसका ऐक्य नहीं हो,
सुत, तिय, मित्रों से कैसे।
चर्म दूर होने पर तन से,
रोम समूह रहे कैसे॥27॥
महा कष्ट पाता जो करता,
पर पदार्थ, जड़-देह संयोग।
मोक्षमहल का पथ है सीधा,
जड़-चेतन का पूर्ण वियोग॥28॥
जो संसार पतन के कारण,
उन विकल्प जालों को छोड़।
निर्विकल्प निद्र्वन्द्व आत्मा,
फिर-फिर लीन उसी में हो॥29॥
स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ,
फल निश्चय ही वे देते।
करे आप, फल देय अन्य तो
स्वयं किये निष्फल होते॥30॥
अपने कर्म सिवाय जीव को,
कोई न फल देता कुछ भी।
पर देता है यह विचार तज स्थिर हो,
छोड़ प्रमादी बुद्धि॥31॥
निर्मल, सत्य, शिवं सुन्दर है,
अमितगति वह देव महान।
शाश्वत निज में अनुभव करते,
पाते निर्मल पद निर्वाण॥32॥
दोहा
इन बत्तीस पदों से जो कोई,
परमातम को ध्याते हैं।
साँची सामायिक को पाकर,
भवोदधि तर जाते हैं॥

सामायिक पाठ की की सरल और असरदार विधियां
- संकल्प: पाठ का असली लाभ तभी मिलता है जब हम इसे अपने जीवन में उतारें। इसके लिए अपने विचारों और व्यवहार में शुद्धता और संयम रखने का संकल्प लें।
- शांत और स्वच्छ स्थान: पाठ के लिए ऐसा जगह चुनें जहाँ शोर-शराबा कम हो और आप बिना किसी रुकावट के एकाग्र हो सकें।
- स्वच्छता और तैयारी: पाठ से पहले स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। कुछ क्षण आंखें बंद करके गहरी सांस लें और मन को शांत करें।
- पाठ की शुरुआत: पाठ शुरू करने से पहले मन में सकारात्मक संकल्प लें कि यह अभ्यास आपको आत्मशुद्धि और मानसिक शांति देगा। शब्दों को धीरे-धीरे और सही उच्चारण के साथ पढ़ें।
- एकाग्रता और भाव: पाठ के दौरान केवल शब्दों और उनके अर्थ पर ध्यान दें। मौखिक पाठ हो तो आवाज़ स्थिर रखें, मानसिक पाठ हो तो पूरी श्रद्धा के साथ शब्दों को आत्मसात करें।
- पाठ के बाद चिंतन: समाप्त होने के बाद कुछ समय शांत बैठें और पाठ के अर्थ पर सोचें। इस दौरान सकारात्मक ऊर्जा को अपने जीवन और व्यवहार में लागू करने का प्रयास करें।
नोट: पाठ समाप्त होने के बाद आप Bhaktamar Stotra Lyrics का पाठ कर सकते है। जो की हिंदी के अलावा Bhaktamar Stotra Sanskrit, Bhaktamar Stotra Marathi और Bhaktamar Stotra Kannada में भी उपलब्ध है।
पाठ के जाप के अद्भुत लाभ
- मानसिक शांति: इस पाठ को करने से मन शांत और एकाग्र रहता है। लगातार अभ्यास से विचारों में स्थिरता और मानसिक संतुलन आता है।
- नकारात्मकता से मुक्ति: यह नकारात्मक विचार और भावनाओं को दूर करता है। जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और खुशी बनी रहती है।
- संयम और अनुशासन: नियमित पाठ से सोच-समझकर काम करने की आदत बढ़ती है। यह हमें अपने विचारों और क्रियाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ आत्मबोध और आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। व्यक्ति अपने जीवन के गहरे अर्थ को समझने में सक्षम होता है।
- भावनात्मक संतुलन: क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहने में मदद करता है। मन हल्का, प्रसन्नचित्त और संतुलित रहता है।
- सही और गलत का भेद: इससे नैतिक मूल्य समझ में आते हैं। निर्णय लेने और अपने कार्यों के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाने की क्षमता मजबूत होती है।
- स्वास्थ्य: मानसिक शांति के कारण शरीर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। तनाव कम होता है और ऊर्जा बनी रहती है, जिससे हम अधिक स्वस्थ और सक्रिय महसूस करते हैं।
- जीवन में संतुलन: नियमित पाठ से आत्मविश्वास, संतोष और शांति बनी रहती है। जीवन अधिक सुखद, सार्थक और संतुलित बन जाता है।
नोट- यह पाठ केवल आध्यात्मिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह आत्मविकास और आंतरिक शांति का भी स्रोत है। इसके नियमित अभ्यास से मन और विचार शांत रहते हैं, जीवन में संतुलन बनता है, और हम एक सकारात्मक और सुकूनभरा जीवन जी सकते हैं।
FAQ
कितनी बार और कितनी देर तक यह पाठ करना चाहिए?
यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। शुरुआत में 10-15 मिनट से किया जा सकता है और धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर 30-45 मिनट तक किया जा सकता है।
क्या इस पाठ के लिए किसी विशेष मंत्र या श्लोक का उच्चारण ज़रूरी है?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस परंपरा या मान्यता को मानता है। कोई भी धार्मिक ग्रंथों का पाठ कर सकता है, या सकारात्मक विचारों से जुड़ी कोई भी सामग्री पढ़ सकता है।
इस पाठ को करने का सही समय क्या है?
यह पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन सुबह या रात को सोने से पहले इसे करने से अधिक शांति और एकाग्रता प्राप्त होती है।
क्या इसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए?
हाँ, यदि इसे रोज़ाना किया जाए, तो यह जीवन में शांति, संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने में मदद करता है।

मैं धर्म पाल जैन एक आध्यात्मिक साधक और जैन धर्म का अनुयायी हूँ। मेरी गहरी आस्था जैन धर्म की शिक्षाओं, भगवान महावीर के सिद्धांतों और भक्तामर स्तोत्र की दिव्य शक्ति में है।मेरी वेबसाइट पर भक्तामर स्तोत्र का संपूर्ण पाठ, उसका अर्थ, पीडीएफ, इमेजेज और भगवान महावीर से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध है।