Bhaktamar Stotra | भक्तामर स्तोत्र: श्रद्धा और भक्ति का अतुलनीय स्तुति

भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का एक अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसे आचार्य मानतुङ्ग ने भगवान आदिनाथ की स्तुति के रूप में रचा। कहा जाता है कि एक क्रुद्ध राजा ने आचार्य को बंदी बना दिया और उन्हें 48 तालों में बंद कर दिया। तब आचार्य ने धर्म की रक्षा और प्रचार के लिए Bhaktamar Stotra का रचनात्मक कार्य शुरू किया।

जैसे-जैसे इस स्तोत्र के श्लोक उच्चारित हुए, 48 तालों के ताले स्वतः खुलते गए। अंततः राजा ने अपनी गलती स्वीकार की और आचार्य के प्रति गहरी भक्ति और सम्मान दिखाया। इसका नियमित पाठ समस्त विघ्न और बाधाओं को नष्ट करता है और प्रत्येक श्लोक को एक विशेष मंत्र के रूप में पूजनीय माना जाता है।

Bhaktamar Stotra

॥श्री आदिनाथाय नमः॥
कालजयी महाकाव्य श्रीमन्मानतुङ्गाचार्य-विरचितम्।

Bhaktamar Stotra

॥श्री आदिनाथाय नमः॥
कालजयी महाकाव्य श्रीमन्मानतुङ्गाचार्य-विरचितम्।

भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्,
सम्यक्-प्रणम्य जिन प-पाद-युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥1॥

अर्थ- जो भगवान जिनेन्द्र देव के सामने भक्त झुकते हैं, तो उनके मुकुटों में जड़ी मणियों की चमक फैल जाती है। वे भगवान पाप रूपी अंधकार को नष्ट करने वाले हैं। कर्मयुग की शुरुआत में,जब संसार रूपी समुद्र में जीव डूब रहे थे, तब वही भगवान सबके लिए सहारा बने। ऐसे जिनेन्द्र देव के चरणों में मैं मन, वचन और कर्म से प्रणाम करके उनकी स्तुति करता हूँ।

य: संस्तुत: सकल-वां मय-तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै:,
स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥2॥

अर्थ- आदिनाथ जिनेन्द्र भगवान की बुद्धि पूरे शास्त्र ज्ञान से उत्पन्न हुई है। उनकी महिमा इतनी महान है कि इन्द्र भी उनकी स्तुति करते हैं और वे अपने गुणों से तीनों लोकों का मन मोहित कर लेते हैं। ऐसे आदिनाथ जिनेन्द्र भगवान की मैं मुनि मानतुंग निश्चय ही स्तुति करता हूँ।

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ!
स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्,
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम्॥3॥

अर्थ- हे जिनेन्द्र भगवान, जिनका सिंहासन देवताओं द्वारा पूजित है, मैं स्वयं को बुद्धिहीन मानते हुए भी
निर्लज्ज होकर आपकी स्तुति करने के लिए आगे बढ़ा हूँ। क्योंकि जैसे पानी में दिखने वाले चन्द्रमा के प्रतिबिंब को सिर्फ़ कोई बालक ही पकड़ने की कोशिश करता है, वैसे ही मेरी स्तुति भी आपकी महानता के सामने
असम्भव और तुच्छ है।

वक्तुं गुणान्गुण-समुद्र ! शशांक-कान्तान्,
कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या,
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥4॥

अर्थ- हे गुणों के भंडार भगवान! आपके चन्द्रमा जैसे सुंदर और निर्मल गुणों को कहने में तो बृहस्पति जैसे महान ज्ञानी भी समर्थ नहीं हैं। और जैसे प्रलयकाल की तेज़ आँधी से भरे, भयंकर मगरमच्छों वाले समुद्र को
कोई भी व्यक्ति अपनी भुजाओं से तैर कर पार नहीं कर सकता, वैसे ही आपकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन
किसी के लिए भी सम्भव नहीं है।

सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश!
कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त:,
प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्
नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥5॥

अर्थ- हे मुनिराज! मैं शक्ति और ज्ञान से रहित, अल्पज्ञ होते हुए भी भक्ति के कारण आपकी स्तुति करने के लिए आगे आया हूँ। जैसे एक हिरणी अपनी शक्ति के बारे में सोचे बिना, केवल प्रेम के कारण अपने बच्चे की रक्षा के लिए सिंह के सामने भी चली जाती है, वैसे ही मैं भी भक्ति से प्रेरित होकर आपकी स्तुति कर रहा हूँ।

अल्प-श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम्,
यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति
तच्चाम्र-चारु-कलिका-निकरैक-हेतु:॥6॥

अर्थ- भले ही मैं अल्पज्ञानी हूँ और विद्वानों की हँसी का पात्र बन सकता हूँ,फिर भी आपकी भक्ति ही मुझे बोलने के लिए मजबूर करती है। जैसे बसंत ऋतु में कोयल मीठा बोलती है,और उसके मधुर स्वर का कारण
सिर्फ आम की कली होती है, वैसे ही मेरी वाणी का कारण भी केवल आपकी भक्ति है।

त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम्,
आक्रान्त-लोक-मलि-नील-मशेष-माशु
सूर्यांशु-भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥7॥

अर्थ- आपकी स्तुति करने से प्राणियों के अनेक जन्मों के संचित पाप कर्म क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं। जैसे पूरे संसार में फैला हुआ रात का अंधकार सूर्य की किरणों से तुरंत समाप्त हो जाता है, वैसे ही आपकी स्तुति से पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं।

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद,-
मारभ्यते तनु-धियापि तव प्रभावात्,
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु
मुक्ता-फल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥8॥

अर्थ- हे स्वामी! यह सोचकर कि आपकी कृपा से मुझ मंदबुद्धि द्वारा किया गया यह स्तवन भी सज्जनों के मन को अच्छा लगेगा, मैं आपकी स्तुति का आरम्भ करता हूँ। जैसे पानी की छोटी-सी बूँद भी कमल के पत्ते पर गिरकर मोती जैसी सुंदर लगने लगती है, वैसे ही आपकी महिमा से मेरी साधारण स्तुति भी शोभा पा जाएगी।

आस्तां तव स्तवन-मस्त-समस्त-दोषं,
त्वत्संकथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति,
दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव
पद्माकरेषु जलजानि विकासभांजि॥9॥

अर्थ- आपका पूर्ण और निर्दोष स्तवन तो बहुत दूर की बात है, आपकी पवित्र कथा सुनने मात्र से ही प्राणियों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जैसे सूर्य स्वयं भले न हो, उसकी किरणें ही तालाब के कमलों को खिला देती हैं, वैसे ही आपकी कथा भी पापों का नाश कर देती है।

नात्यद्-भुतं भुवन-भूषण ! भूूत-नाथ!
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त-मभिष्टुवन्त:,
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति॥10॥

अर्थ- हे जगत् के भूषण, हे प्राणियों के नाथ! जो पुरुष सच्चे गुणों के साथ आपकी स्तुति करते हैं, यदि वे इस संसार में आपके समान बन जाते हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि ऐसा स्वामी ही सच्चा होता है, जो अपने आश्रित को अपनी ही तरह गुण और समृद्धि से श्रेष्ठ बना देता है।

दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष-विलोकनीयं,
नान्यत्र-तोष-मुपयाति जनस्य चक्षु:,
पीत्वा पय: शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो:
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥11॥

अर्थ- हे अत्यन्त दर्शनीय प्रभु! आपके दर्शन हो जाने के बाद मनुष्य की आँखें किसी और में संतोष नहीं पातीं। जैसे कोई व्यक्ति चन्द्रकिरणों जैसा निर्मल क्षीरसागर का मीठा जल पी ले, तो वह फिर समुद्र का खारा पानी कभी नहीं पीना चाहेगा, वैसे ही आपके दर्शन के बाद अन्य सब आकर्षण फीके लगते हैं।

यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं,
निर्मापितस्-त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत,
तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां
यत्ते समान-मपरं न हि रूप-मस्ति॥12॥

अर्थ- हे त्रिभुवन के अनमोल आभूषण, जिनेन्द्रदेव! आपका शरीर जो सुन्दर परमाणुओं से बना है, वे परमाणु पृथ्वी पर उतने ही हैं, क्योंकि आपके समान और कोई रूप नहीं है।

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,
नि:शेष-निर्जित-जगत्त्रितयोपमानम्,
बिम्बं कलंक-मलिनं क्व निशाकरस्य
यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥

अर्थ- हे प्रभु! जो पूरी तरह से तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ हैं और देव, मनुष्य तथा पृथ्वी के स्वामी के लिए भी दृष्टि आकर्षित करने वाले हैं, उनका मुख कहाँ है? और वह चन्द्रमा का मंडल, जो कलंक से मलिन हो गया है और दिन में पलाश (ढाक) के पत्ते की तरह फीका पड़ जाता है, वह कहाँ है?

सम्पूर्ण-मण्डल-शशांक-कला-कलाप-
शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लंघयन्ति,
ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं
कस्तान् निवारयति संचरतो यथेष्टम्॥14॥

अर्थ- आपके गुण पूर्ण चन्द्र की तरह उज्ज्वल हैं और तीनों लोकों में फैले हुए हैं। जो आपके आश्रित हैं, वे त्रिजगत् के नाथ होने के कारण आपकी इच्छा के अनुसार घूमते हैं, और इसे रोकने वाला कोई नहीं है।

चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशांग-नाभिर्-
नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम्,
कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन
किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥15॥

अर्थ- यदि आपका मन देवांगनाओं के प्रयासों से भी थोड़ा सा भी विचलित नहीं हो सकता, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। जैसे प्रलयकाल की तेज़ हवा पहाड़ों को हिला देती है, लेकिन कभी मेरु पर्वत का शिखर हिला नहीं सकता, वैसे ही आपका मन अचल और स्थिर है।

निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैल-पूर:,
कृत्स्नं जगत्त्रय-मिदं प्रकटीकरोषि,
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥16॥

अर्थ- हे स्वामी! आप बिना धूम और बाती के, बिना तेल के प्रवाह के भी संपूर्ण जगत को प्रकाशित करने वाले अद्भुत दीपक हैं। जैसे पर्वतों को हिला देने वाली तेज़ हवा भी दीपक को बुझा नहीं सकती, वैसे ही आपकी महिमा और प्रकाश हमेशा स्थिर और अविनाशी हैं।

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्-जगन्ति,
नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभाव:
सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥17॥

अर्थ- हे मुनीन्द्र! आप कभी अस्त नहीं होते, न राहु आपको ग्रहण कर सकता है, और न आपका तेज़ मेघों से कम होता है। आप एक साथ तीनों लोकों को तुरंत प्रकाशित कर देते हैं। इसलिए आप सूर्य से भी अधिक महिमावान हैं।

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,
गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्,
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशांक-बिम्बम्॥18॥

अर्थ- आप हमेशा उदित रहते हैं और मोहरुपी अंधकार को दूर करते हैं।
न राहु आपको ग्रहण कर सकता है, न मेघ आपका तेज ढक सकते हैं।
आपका मुखकमल जगत को प्रकाशित करता है और उसकी चमक चंद्रमा जैसी अपूर्व होती है।

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तम:सु नाथ!,
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥19॥

अर्थ- हे स्वामी! जब अंधकार आपके मुख के रूप चंद्रमा से दूर हो जाता है, तो रात में चंद्रमा और दिन में सूर्य की क्या आवश्यकता? जैसे पकते हुए धान के खेतों में पानी से झुके बादल का क्या काम? आपके प्रकाश और ज्ञान के सामने अन्य सब चीजें फीकी हैं।

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु,
तेजो महा मणिषु याति यथा महत्त्वं
नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि॥20॥

अर्थ- जैसे आपको ज्ञान में पूर्णता मिली है और यह हमेशा चमकता है, वैसा ज्ञान विष्णु, महेश और अन्य देवों में नहीं है। जैसे मणियों में तेज और महत्व होता है, वैसा प्रकाश भी काँच के टुकड़े में नहीं मिलता, लेकिन आपकी महिमा में यह हमेशा स्पष्ट है।

मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति,
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:
कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥21॥

अर्थ- हे स्वामी! मैं मानता हूँ कि उत्तम देवता वही हैं जिन्हें देखकर मन प्रसन्न होता है, जैसे विष्णु और महादेव। लेकिन आपका दर्शन तो ऐसा है कि इसे देखकर भी कोई दूसरा देवता कभी संतुष्ट नहीं हो सकता,
आपमें ही सबका मन पूर्ण होता है।

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता,
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम्॥22॥

अर्थ- सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्र जन्म देती हैं, लेकिन आपकी तरह कोई दूसरा पुत्र पैदा नहीं कर सकती।
जैसे सभी दिशाएँ नक्षत्रों को धारण करती हैं, पर सूर्य की तेजस्वी किरणों से केवल पूर्व दिशा प्रकाशित होती है।

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-
मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्,
त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं
नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥23॥

अर्थ- हे मुनीन्द्र! तपस्वीजन आपको सूर्य के समान तेजस्वी, निर्मल और मोह के अंधकार से परे मानते हैं।
आप ही मोक्ष को प्राप्त कर म्रत्यु को जीतने का मार्ग दिखाते हैं। इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता मोक्ष पाने का नहीं है।

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माणमीश्वर-मनन्त-मनंग-केतुम्,
योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त:॥24॥

अर्थ- सज्जन लोग आपको शाश्वत, सब पर व्यापक, अद्भुत, अनंत और योगियों के ज्ञानी मानते हैं।
वे कहते हैं कि आप ब्रह्मा, ईश्वर, अनंगकेतु और ज्ञानस्वरूप हैं।

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,
त्वं शंकरोऽसि भुवन-त्रय-शंकरत्वात्,
धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्
व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥25॥

अर्थ- देव और विद्वानों के द्वारा पूजित होकर भी आप ही बुद्ध हैं। तीनों लोकों में शांति करने के कारण आप ही शंकर हैं। मोक्षमार्ग के विधान करने वाले होने से आप ही ब्रह्मा हैं। और स्पष्ट रूप से, आप ही उत्तम पुरुष या नारायण हैं।

तुभ्यं नमस्-त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ!
तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल-भूषणाय,
तुभ्यं नमस्-त्रिजगत: परमेश्वराय
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥26॥

अर्थ- हे स्वामी! आपको नमस्कार हो, जो तीनों लोकों के दुःख को दूर करते हैं। आपको नमस्कार हो, जो पृथ्वी के सुंदर आभूषण हैं। आपको नमस्कार हो, जो तीनों जगत के परमेश्वर हैं। आपको नमस्कार हो, जो संसार के समुद्र को सुखा देने वाले हैं।

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश!,
दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥27॥

अर्थ- हे मुनीश! यदि सभी गुण आपके पास हैं और आप दूसरों के पास नहीं हैं, और अहंकार से भरे दोष भी आपको कभी न देख पाएं, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

उच्चै-रशोक-तरु-संश्रितमुन्मयूख-
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्,
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥28॥

अर्थ- आपका उज्ज्वल रूप ऐसा है, जैसे ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे उगते हुए सूर्य की किरणें, जो अंधकार और मेघों को दूर करती हैं, स्पष्ट और चमकदार दिखाई देती हैं।

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्,
बिम्बं वियद्-विलस-दंशुलता-वितानं
तुंगोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे:॥29॥

अर्थ- सिंहासन, जो मणियों से सुसज्जित है, आपका शरीर, जो सोने के समान चमकता है, और किरणों जैसी लताओं के साथ, उदयाचल पर्वत की चोटियों पर सूर्य मण्डल की तरह शोभा पाता है।

कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपु: कलधौत-कान्तम्,
उद्यच्छशांक-शुचिनिर्झर-वारि-धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम्॥30॥

अर्थ- कुन्द पुष्प के समान सफेद चँवरों और सुंदर सजावट के साथ, आपका सोने जैसा शरीर, सुमेरु पर्वत और चन्द्रमा जैसे झरनों की धारा के बीच, स्वर्ण निर्मित ऊँचे तट की तरह उज्ज्वल और भव्य दिखाई देता है।

छत्रत्रयं-तव-विभाति शशांककान्त,
मुच्चैः स्थितं स्थगित भानुकर-प्रतापम्,
मुक्ताफल-प्रकरजाल-विवृद्धशोभं
प्रख्यापयत्त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्॥31॥

अर्थ- आपके ऊपर तीन छत्र हैं जो तीनों लोकों में आपके स्वामित्व को दिखाते हैं। आप सूर्य की किरणों को रोकने वाले और मोतियों जैसी चमक धारण करने वाले हैं।

गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभागस्-
त्रैलोक्य-लोक-शुभ-संगम-भूति-दक्ष:,
सद्धर्म-राज-जय-घोषण-घोषक: सन्
खे दुन्दुभि-ध्र्वनति ते यशस: प्रवादी॥32॥

अर्थ- आपका नाम और यश दिशाओं में गूंजता है। आप तीनों लोक के जीवों को शुभता देते हैं और जैन धर्म की जय का प्रचार करते हैं।

मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात-
सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि-रुद्घा,
गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता
दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥33॥

अर्थ- आपके वचनों की तरह आकाश से पुष्पों की वर्षा होती है, सुगंधित जल और वायु के साथ।

शुम्भत्-प्रभा-वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोक-त्रये-द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती,
प्रोद्यद्-दिवाकर-निरन्तर-भूरि-संख्या
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥

अर्थ- आपकी विशाल और मनोहर चमक तीनों लोक की अन्य सारी चमक को पीछे छोड़ देती है, सूर्य और चन्द्रमा की चमक भी आपकी तुलना में फीकी है।

स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्ट:,
सद्धर्म-तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्या:,
दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥35॥

अर्थ- आपकी दिव्य ध्वनि साधकों को मोक्ष और धर्म का मार्ग दिखाती है। तीनों लोक में जीवों को सही धर्म की शिक्षा देने में सक्षम है।

उन्निद्र-हेम-नव-पंकज-पुंज-कान्ती,
पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ,
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:
पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥36॥

अर्थ- आपके चरणों में जहां पड़ते हैं, वहाँ देव लोग स्वर्ण कमलों का निर्माण कर देते हैं। आपके नखों की किरण कमलों जैसी चमक देती है।

॥अन्तरंग-बहिरंग लक्ष्मी के स्वामी मंत्र॥
इत्थं यथा तव विभूति-रभूज्-जिनेन्द्र्र!,
धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य।
यादृक्-प्र्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,
तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥37॥

अर्थ- धर्मोपदेश और अंधकार नाश के कार्य में आपका ऐश्वर्य अद्वितीय है। ग्रहों की भी तुलना में आपकी प्रभा सर्वोत्तम है।

॥हस्ती भय निवारण मंत्र॥
श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल
मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्,
ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥38॥

अर्थ- आपके आश्रितों को किसी भी भय का सामना नहीं करना पड़ता। जैसे ऐरावत हाथी भी आपके आश्रित पर हमला नहीं करता।

॥सिंह-भय-विदूरण मंत्र॥
भिन्नेभ-कुम्भ-गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त
मुक्ता-फल-प्रकरभूषित-भूमि-भाग:,
बद्ध-क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥39॥

अर्थ- जो आपके चरणकमल का आश्रय लेते हैं, उन पर सिंह या हाथी का हमला भी असर नहीं करता। वे पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।

॥अग्नि भय-शमन मंत्र॥
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि-कल्पं,
दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिंगम्,
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥40॥

अर्थ- आपके नाम का यशोगान इतना शक्तिशाली है कि प्रलयकाल की आग और तेज़ हवा जैसी विपत्ति भी उससे शांत हो जाती है।

॥सर्प-भय-निवारण मंत्र॥
रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्,
क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्,
आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शंकस्-
त्वन्नाम-नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥41॥

अर्थ- जो पुरुष आपके नाम (नागदौन औषध) को अपने हृदय में रखता है, वह क्रोधित, मदयुक्त सर्प जैसी शक्तिशाली चीज़ों को भी निश्चिंत होकर पार कर जाता है।

॥रण-रंगे-शत्रु पराजय मंत्र॥
वल्गत्-तुरंग-गज-गर्जित-भीमनाद-
माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्,
उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति:॥42॥

अर्थ- आपके यशोगान से युद्ध में घोड़े और हाथियों की गर्जना जैसी ताकत भी भयभीत हो जाती है।
सूर्य की किरणों की तरह आपकी महिमा से अंधकार और भय नष्ट हो जाते हैं।

॥रणरंग विजय मंत्र॥
कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह,
वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे,
युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-
त्वत्पाद-पंकज-वनाश्रयिणो लभन्ते:॥43॥

अर्थ- जो आपके चरणकमल के वन का आश्रय लेते हैं, वे भालों से घायल हाथियों और युद्ध में खतरनाक परिस्थितियों के बीच भी सुरक्षित रहते हैं। वे दुर्जय शत्रु पक्ष को भी आसानी से जीत जाते हैं।

॥समुद्र उल्लंघन मंत्र॥
अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-
पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ,
रंगत्तरंग-शिखर-स्थित-यान-पात्रास्-
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति:॥44॥

अर्थ- जो व्यक्ति आपके स्मरण में रहता है, वह भयभीत समुद्र और भयंकर लहरों के बीच भी सुरक्षित होकर पार हो जाता है।

॥रोग-उन्मूलन मंत्र॥
उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्ना:,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:,
त्वत्पाद-पंकज-रजो-मृत-दिग्ध-देहा:
मत्र्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥45॥

अर्थ- जो आपके चरणकमल की रज (अमृत जैसी पवित्रता) से जुड़े हैं, वे रोग और जीवन की कठिनाइयों से मुक्त होकर सुंदर और शक्तिशाली बन जाते हैं।

॥बन्धन मुक्ति मंत्र॥
आपाद-कण्ठमुरु-शृंखल-वेष्टितांगा,
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जंघा:,
त्वन्-नाम-मन्त्र-मनिशं मनुजा: स्मरन्त:
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति:॥46॥

अर्थ- जिनका शरीर जंजीरों और बंधनों में जकड़ा हुआ है, वे निरंतर आपके नाममंत्र का स्मरण करते हैं और शीघ्र ही बन्धन और कैद से मुक्त हो जाते हैं।

॥सकल भय विनाशन मंत्र॥
मत्त-द्विपेन्द्र-मृग-राज-दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध-नोत्थम्,
तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते:॥47॥

अर्थ- जो बुद्धिमान व्यक्ति आपके इस स्तवन को पढ़ता है, उसका भय—हाथी, सिंह, युद्ध, आग, समुद्र, रोग या बंधन— सब दूर हो जाता है और वह सुरक्षित हो जाता है।

॥जिन-स्तुति-फल मंत्र॥
स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,
भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्,
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं
तं मानतुंग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥48॥

अर्थ- हे जिनेन्द्र देव! जो भक्तिपूर्वक मेरी बनाई हुई स्तुति माला को अपने कंठ पर धारण करता है,
उससे स्वर्ग, मोक्ष और सभी दिव्य विभूतियाँ निश्चित रूप से प्राप्त होती हैं।

– आचार्य मानतुंग

Bhaktamar Stotra

॥श्री आदिनाथाय नमः॥
कालजयी महाकाव्य श्रीमन्मानतुङ्गाचार्य-विरचितम्।

भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्,
सम्यक्-प्रणम्य जिन प-पाद-युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥1॥

य: संस्तुत: सकल-वां मय-तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै:,
स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥2॥

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ!
स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्,
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम्॥3॥

वक्तुं गुणान्गुण-समुद्र ! शशांक-कान्तान्,
कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या,
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥4॥

सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश!
कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त:,
प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्
नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥5॥

अल्प-श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम्,
यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति
तच्चाम्र-चारु-कलिका-निकरैक-हेतु:॥6॥

त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम्,
आक्रान्त-लोक-मलि-नील-मशेष-माशु
सूर्यांशु-भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥7॥

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद,-
मारभ्यते तनु-धियापि तव प्रभावात्,
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु
मुक्ता-फल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥8॥

आस्तां तव स्तवन-मस्त-समस्त-दोषं,
त्वत्संकथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति,
दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव
पद्माकरेषु जलजानि विकासभांजि॥9॥

नात्यद्-भुतं भुवन-भूषण ! भूूत-नाथ!
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त-मभिष्टुवन्त:,
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति॥10॥

दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष-विलोकनीयं,
नान्यत्र-तोष-मुपयाति जनस्य चक्षु:,
पीत्वा पय: शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो:
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥11॥

यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं,
निर्मापितस्-त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत,
तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां
यत्ते समान-मपरं न हि रूप-मस्ति॥12॥

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,
नि:शेष-निर्जित-जगत्त्रितयोपमानम्,
बिम्बं कलंक-मलिनं क्व निशाकरस्य
यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥

सम्पूर्ण-मण्डल-शशांक-कला-कलाप-
शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लंघयन्ति,
ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं
कस्तान् निवारयति संचरतो यथेष्टम्॥14॥

चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशांग-नाभिर्-
नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम्,
कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन
किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥15॥

निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैल-पूर:,
कृत्स्नं जगत्त्रय-मिदं प्रकटीकरोषि,
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥16॥

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्-जगन्ति,
नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभाव:
सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥17॥

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,
गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्,
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशांक-बिम्बम्॥18॥

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तम:सु नाथ!,
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥19॥

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु,
तेजो महा मणिषु याति यथा महत्त्वं
नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि॥20॥

मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति,
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:
कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥21॥

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता,
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम्॥22॥

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-
मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्,
त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं
नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥23॥

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माणमीश्वर-मनन्त-मनंग-केतुम्,
योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त:॥24॥

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,
त्वं शंकरोऽसि भुवन-त्रय-शंकरत्वात्,
धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्
व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥25॥

तुभ्यं नमस्-त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ!
तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल-भूषणाय,
तुभ्यं नमस्-त्रिजगत: परमेश्वराय
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥26॥

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश!,
दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥27॥

उच्चै-रशोक-तरु-संश्रितमुन्मयूख-
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्,
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥28॥

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्,
बिम्बं वियद्-विलस-दंशुलता-वितानं
तुंगोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे:॥29॥

कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपु: कलधौत-कान्तम्,
उद्यच्छशांक-शुचिनिर्झर-वारि-धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम्॥30॥

छत्रत्रयं-तव-विभाति शशांककान्त,
मुच्चैः स्थितं स्थगित भानुकर-प्रतापम्,
मुक्ताफल-प्रकरजाल-विवृद्धशोभं
प्रख्यापयत्त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्॥31॥

गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभागस्-
त्रैलोक्य-लोक-शुभ-संगम-भूति-दक्ष:,
सद्धर्म-राज-जय-घोषण-घोषक: सन्
खे दुन्दुभि-ध्र्वनति ते यशस: प्रवादी॥32॥

मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात-
सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि-रुद्घा,
गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता
दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥33॥

शुम्भत्-प्रभा-वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोक-त्रये-द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती,
प्रोद्यद्-दिवाकर-निरन्तर-भूरि-संख्या
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥

स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्ट:,
सद्धर्म-तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्या:,
दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥35॥

उन्निद्र-हेम-नव-पंकज-पुंज-कान्ती,
पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ,
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:
पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥36॥

॥अन्तरंग-बहिरंग लक्ष्मी के स्वामी मंत्र॥
इत्थं यथा तव विभूति-रभूज्-जिनेन्द्र्र!,
धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य।
यादृक्-प्र्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,
तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥37॥

॥हस्ती भय निवारण मंत्र॥
श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल
मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्,
ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥38॥

॥सिंह-भय-विदूरण मंत्र॥
भिन्नेभ-कुम्भ-गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त
मुक्ता-फल-प्रकरभूषित-भूमि-भाग:,
बद्ध-क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥39॥

॥अग्नि भय-शमन मंत्र॥
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि-कल्पं,
दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिंगम्,
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥40॥

॥सर्प-भय-निवारण मंत्र॥
रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्,
क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्,
आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शंकस्-
त्वन्नाम-नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥41॥

॥रण-रंगे-शत्रु पराजय मंत्र॥
वल्गत्-तुरंग-गज-गर्जित-भीमनाद-
माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्,
उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति:॥42॥

॥रणरंग विजय मंत्र॥
कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह,
वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे,
युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-
त्वत्पाद-पंकज-वनाश्रयिणो लभन्ते:॥43॥

॥समुद्र उल्लंघन मंत्र॥
अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-
पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ,
रंगत्तरंग-शिखर-स्थित-यान-पात्रास्-
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति:॥44॥

॥रोग-उन्मूलन मंत्र॥
उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्ना:,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:,
त्वत्पाद-पंकज-रजो-मृत-दिग्ध-देहा:
मत्र्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥45॥

॥बन्धन मुक्ति मंत्र॥
आपाद-कण्ठमुरु-शृंखल-वेष्टितांगा,
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जंघा:,
त्वन्-नाम-मन्त्र-मनिशं मनुजा: स्मरन्त:
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति:॥46॥

॥सकल भय विनाशन मंत्र॥
मत्त-द्विपेन्द्र-मृग-राज-दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध-नोत्थम्,
तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते:॥47॥

॥जिन-स्तुति-फल मंत्र॥
स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,
भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्,
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं
तं मानतुंग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥48॥
– आचार्य मानतुंग

यह स्तोत्र केवल शब्दों का संगम नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों से उपजी भक्ति की पवित्र धारा है। इसकी साधना से तन-मन शुद्ध होते हैं और कर्मों के बंधन कम होते हैं। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ करने पर साधक के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं, आप इसे मोबाइल में पढ़ने के लिए Bhaktamar Stotra PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

भक्तामर स्तोत्र का अनुवाद अब तक कितनी भाषाओं में हुआ है?

इस स्तोत्र का अनुवाद अब तक करीब 130 बार किया जा चुका है और यह कई भाषाओं में उपलब्ध है। भक्तामर स्तोत्र संस्कृत से अनूदित होकर यह अंग्रेजी, हिंदी, भक्तामर स्तोत्र गुजराती, भक्तामर स्तोत्र मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, भक्तामर स्तोत्र कन्नड़, मलयालम, उर्दू, पंजाबी सहित कई अन्य भाषाओं में पढ़ा और गाया जाता है। इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, जिससे अधिक से अधिक लोग इस दिव्य स्तोत्र का लाभ उठा सकें और इसकी आध्यात्मिक ऊर्जा को अनुभव कर सकें।

स्तोत्र की जप विधि: भक्ति से मोक्ष की ओर

  1. शुद्धि और संकल्प: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। शांत और पवित्र स्थान पर बैठकर भगवान आदिनाथ का ध्यान करें और मन में संकल्प लें कि यह जप श्रद्धा और आत्मिक शुद्धि के लिए किया जा रहा है।
  2. स्थान और आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके किसी आरामदायक आसन (कुश, ऊन या रेशमी वस्त्र) पर बैठें। आसन स्थिर रखें ताकि ध्यान केंद्रित रहे।
  3. दीप, धूप और भोग अर्पण: भगवान ऋषभदेव के सामने दीप जलाएँ, धूप और भोग अर्पित करें। इससे वातावरण में सात्त्विक ऊर्जा का संचार होता है।
  4. मानसिक शुद्धि: मन को शांत करें और श्रद्धा भाव से अनुभव करें कि भगवान आदिनाथ आपकी ओर कृपा कर रहे हैं।
  5. स्तोत्र का पाठ: यदि संभव हो तो पूरे 48 श्लोक श्रद्धा सहित पढ़ें। किसी विशेष लाभ या सिद्धि के लिए संबंधित श्लोक का 108 बार जप करें। मंत्रोच्चार स्पष्ट और श्रद्धा से भरपूर होना चाहिए।
  6. विशेष जप अनुष्ठान: कुछ साधक किसी विशेष उद्देश्य के लिए 44 दिनों तक इस स्तोत्र का पाठ करते हैं।
  7. समर्पण और आभार: पाठ के अंत में भगवान आदिनाथ से प्रार्थना करें कि उनकी कृपा और आशीर्वाद आपके जीवन में सदा बने रहें।

Bhaktamar Path से निम्नलिखित लाभ होते हैं:

आपके लाभ के लिए Bhaktamar Path के नियमित पाठ से मिलने वाले प्रमुख फायदे नीचे उपलब्ध कराए गए हैं, जो जीवन में शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति लाने में सहायक हैं:

  • आध्यात्मिक उन्नति: इस स्तोत्र को श्रद्धा और समझ के साथ पढ़ने से भीतर सात्त्विक ऊर्जा का संचार होता है। अहंकार, क्रोध, लोभ और अन्य मानसिक विकार धीरे-धीरे कम होते हैं और आत्मा पवित्र होती है।
  • संकट से मुक्ति: पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ पाठ करने से जीवन की कठिनाइयाँ कम होती हैं। यह बाहरी समस्याओं के साथ-साथ आंतरिक अशांति और भय को भी दूर करने में मदद करता है।
  • रोगों से मुक्ति: इस स्तोत्र का पाठ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने में सहायक होता है। श्रद्धा के साथ पढ़ने पर इसका प्रभाव दवा से भी अधिक चमत्कारी अनुभव हो सकता है।
  • आर्थिक समृद्धि: नियमित पाठ से जीवन में समृद्धि और सफलता के मार्ग खुलते हैं। यह आर्थिक परेशानियाँ दूर करने के साथ नौकरी और व्यवसाय में उन्नति भी प्रदान करता है।
  • मन की शांति: नित्य पाठ से मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद कम होते हैं। इससे व्यक्ति के मन में नई ऊर्जा का संचार होता है और सोच सकारात्मक बनती है।
  • चमत्कारी प्रभाव: यह स्तोत्र संतों और तपस्वियों द्वारा सिद्ध माना गया है। इसकी साधना से साधक को विशेष आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
  • मोक्ष मार्ग: श्रद्धा और समर्पण भाव से जाप करने पर कर्मों का क्षय होता है और व्यक्ति आत्मिक शांति की ओर बढ़ता है। यह स्तोत्र मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करने में सहायक है।

Note – इस स्तोत्र की महिमा अपार है। इसका जप न केवल भौतिक सुख और समृद्धि देता है, बल्कि आत्मा को परम आनंद की ओर भी ले जाता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करने पर साधक के जीवन में अद्भुत परिवर्तन आते हैं और वह अपने भीतर दिव्य ऊर्जा का अनुभव करता है।

FAQ

इस स्तोत्र का जप कितनी बार करना चाहिए?

संपूर्ण स्तोत्र को एक बार या 3, 5, 7, 11 या 21 बार पढ़ा जा सकता है। यदि विशेष लाभ के लिए पाठ किया जा रहा हो, तो संबंधित श्लोक का 108 बार जप करना अत्यधिक प्रभावी माना जाता है।

क्या इस स्तोत्र को किसी विशेष इच्छा पूर्ति के लिए पढ़ा जा सकता है?

क्या इस स्तोत्र का पाठ केवल जैन धर्म के लोग ही कर सकते हैं?

क्या इस पवित्र स्तोत्र से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है?

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